Thursday, 13th December 2018

List of Samskaaras

संस्कार - जागरूक जीवन

 

पहले ही उल्लेख किया है की "संस्कार" का मतलब है "शोधन",“अच्छा बनाना”,“शुद्ध करना” आदि | 

लेकिन इस शब्द का अधिक समझ "मानसिक धारणा" या "संस्कृति" है.  हम जो सोचते और करते हैं ,हम वही बन जाते हैं |

मनुष्य को अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने की स्वतंत्रता है,  पर वह ये न भूले की उसके बच्चे और उसके आसपास के समाज उसे देख रहे हैं और हमेशा उससेसीख रहे हैं।

एक गुणवत्ता घर से एक गुणवत्ता समाज पैदा होता है।

इस व्यापक परिप्रेक्ष्य के साथ हमारे ऋषियों (वेदों के विशेषज्ञों) ने हमें धर्मशास्स्त्रों (स्मृतियों का संग्रह) और पुराणों के रूप मे

एक जागरूक जीवन जीने की मार्गदर्शन दी हैं।

“संस्कार” ऊपर सूचीबद्ध अनमोल ग्रंथों का एक उद्धरण हैं. धार्मिक संस्कारों को निभाने से मनुष्य अपने मन को शुद्ध एवं स्थिर रख सकता है और इस तरह वह आत्मा पर अच्छा धारणा/प्रदर्शन बरकरार सकता है |

तो अब संस्कार के २ अर्थों के बीच की दूरी निकल गयी होगी |

हमने यहाँ ४६ संस्कारों को सूचीबद्ध किया है. 

1. पहले 20 संस्कारों, (5 )पञ्चमाहयज्ञ और 7 पाक यज्ञ स्मार्त कर्म में वर्गीकृत किया गया है | ये सब  "औपासन अग्नि"/"गृह्य अग्नि" या "एकाग्नि" नामक एक अग्नि की उपस्थिति में किया जाता है |  ये सब कर्म ज्यादातर घर पर किया जाता है , इसलिए इनको गृह्य कर्म भी कहते हैं। स्मार्त कर्म गृहस्थ और उसके परिवार के लिए हैं. स्मार्त/गगृह्य कर्मों का स्पष्टीकरण और प्रक्रियाओं स्मृतियों और गृह्य सूत्रों मे प्रस्तुत है। 
 
2. परवर्ती दिये गए 7 हविरयज्ञ और 7 सोमयज्ञ श्रौत कर्मा में वर्गीकृत किया जाता है. ये सब 3 अगनियों अर्थात "त्रेताग्नि", 1। गार्हपत्य  अग्नि, 2। आहवनीय अग्नि और 3। दक्षिणाग्नि  के साथ किया जाता है |  श्रौता कर्मों विस्तार से किया जाता है,  कुछ घर पर किया जाता है और कुछ विशेष यागशाला मे बड़े पैमाने पर किया जाता है |  ये  या मानव शांति के लिए या किसी कुल के लिए किया जाता है।  श्रौता कर्मों  स्पष्टीकरण और प्रक्रियाओं कल्प सूत्रों मे प्रस्तुत है। 
 

स्मृतियों मे मनुष्य के ४० संस्कारों और ८ आत्मगुणों का वर्णन है |

ऋषि गौतम, अपने धर्मशास्त्र  में  अध्याय 8, संस्कारवर्णान  में कहते हैं :-

 

गर्भाधानपुंसवनसीमन्तॊन्नयनजातकर्मनामकरणन्नप्राशनचौडॊपनयनं चत्वारि वॆदव्रतानि स्नानं सहदर्म्मचारिणॊ सम्यॊग: पञ्चानां यज्ञानामनुष्ठानं दॆव पितृ मनुष्य भूत ब्रह्मणामॆतॆषाञ्चाष्टका पार्वणश्राद्ध श्रावण्याग्रहायणी चैत्राश्वयुजीति  सप्त पाकयज्ञसंस्था अग्न्याधॆयमग्निहॊत्र दर्शपौर्णमासावग्रहणं चातुर्म्मास्यनिरूढपशुबन्ध श्रॊत्रामणीति सप्त हविर्यज्ञसंस्थां अग्निष्तॊमॊऽत्यग्निष्टोम उक्थ: षॊडशि वाजपॆयऽतिरात्रॊप्तॊर्य्याम इति सप्त सॊमसंस्था इत्यतॆ चत्वारिंशत् संस्कारा: ।                                                                                                                             अथाष्टावात्मगुणा: दया सर्वभूतॆषु क्षान्तिरनसूया । शौचमनायासॊमङ्गलमकार्पण्यं स्पृहॆति |                                   यस्य तु खलु संस्काराणामॆकदॆशॊऽप्यष्टावात्मगुणा अथ स ब्रह्मण: सायुज्यं सालॊक्यञ्च गच्छति गच्छति ।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                               -----                                                                                                                                                                       गौतम धर्मशास्त्रम्, अष्टमोऽध्याय: , सस्कारवर्णनम्                     

संस्कारों का सूचीबद्ध :-
 
१. गर्भाधान २. पुम्सवन ३. सीमन्तॊन्नयन ४. जातकर्मा ५. नामकरण ६. अन्नप्रासन
७. चूदाकरण ८. उपनयन , ४ वॆद व्रत - (९-१२) ९. प्राजापत्य १०. सौम्य ११. आग्नॆय
१२. वैस्वदॆव १३. स्नान १४.  विवाहा, ५- पञ्च महायज्ञ - १५. दॆव यज्ञ १६. पितृ यज्ञ
१७. भूत यज्ञ १८. ब्रह्म यज्ञ १९. मनुष्य यज्ञ और ७ पाक यज्ञ- २०. अष्टका २१. पर्वनि
२२. स्थालि पाक २३. श्रावनि २४. आग्रहायनि २५. चैत्री २६. आश्वयुजि और ७ हविर यज्ञ -
२७. अग्नियाधान २८. अग्निहॊत्र २९. दर्शपौर्णमास ३०. अग्रहायन ३१. चातुर्मास्य
३२. निरूढपशुबन्धन ३३. शौत्रामणी और ७ सॊम यज्ञ्या - ३४. अग्निष्ठॊम ३५. अत्यग्निष्ठोम
३६. उक्थ्य ३७. षॊडशि ३८. वाजपेय ३९. अप्तोर्यम ४०. अतिरात्र.
 
८ आत्मा गुणों का सूचीबद्ध:-
 
१। दया सर्वभूतेशु - सभी जीवित प्राणियों पर दया - पशु, मनुष्य,, आदि |
२। क्षांति - सभी समय पर धीरज और धैर्य रखे |
३। अनसूय - कभी किसीपर ईर्ष्या (जलन) न करें |
४। शौच - हमेशा मन को शुद्ध रखें |
५। अनायास - खुद परेशान न रहें और दूसरों को भी परेशान न करें |
६। मंगलं - हमेशा शुभ सोचे और शुभ दिलवाएँ |
७। अकार्पण्य - सहानुभूति से  रहें और उदार करें | 
८। अस्पृहा - इच्छा से मुक्त रहें |
 
जो इन ४० संस्कारों को अधिक से अधिक  पालन करता है  और इन ८ आत्मगुणों को अधिकांश अपनाता है वह ब्रह्मण (परमात्मा) के साथ उनके लोक मे बसेगा |